उदयपुर। सावन मास के चौथे सोमवार को नारायण सेवा संस्थान में चल रही ‘भोलेनाथ की शरण में अपनों से अपनी बात’ शिव कथा में समुद्र मंथन का प्रसंग सुनाया गया। संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल भैया जी ने व्यासपीठ से भगवान शिव के नीलकंठ स्वरूप की कथा के माध्यम से अहंकार से बचने, संयम रखने, सहयोग की भावना अपनाने और लोक कल्याण के लिए त्याग करने का संदेश दिया।
कथा में भैया जी ने समुद्र मंथन की शुरुआत से जुड़े प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि एक बार दुर्वासा ऋषि ने देवराज इंद्र को श्री से परिपूर्ण दिव्य माला भेंट की। इंद्र ने उस माला को अपने हाथी ऐरावत पर रख दिया। ऐरावत ने माला को जमीन पर गिरा दिया और उसे पैरों से कुचल दिया। इस घटना से क्रोधित होकर दुर्वासा ऋषि ने इंद्र को शाप दिया कि तीनों लोक श्री और ऐश्वर्य से विहीन हो जाएंगे।
शाप के प्रभाव से देवताओं की शक्ति कमजोर पड़ गई। इसी का लाभ उठाकर राजा बलि के नेतृत्व में असुरों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया और उन्हें पराजित कर दिया। संकट में पड़े देवता पहले ब्रह्मा जी और फिर भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे। भगवान विष्णु ने देवताओं को असुरों से सीधे युद्ध करने के बजाय उनके साथ संधि कर समुद्र मंथन के जरिए अमृत प्राप्त करने का मार्ग सुझाया।
भैया जी ने कहा कि समुद्र मंथन केवल पौराणिक घटना नहीं, बल्कि जीवन का भी बड़ा संदेश है। जब अलग-अलग शक्तियां और विचार एक उद्देश्य के लिए साथ आते हैं तो कठिन से कठिन कार्य भी संभव हो जाता है। हालांकि इस प्रक्रिया में संघर्ष और विष भी निकलता है, लेकिन धैर्य और संयम के साथ उसका सामना करना जरूरी है।
उन्होंने बताया कि समुद्र मंथन से एक-एक कर चौदह रत्न प्रकट हुए। इनमें सबसे पहले हलाहल विष निकला। इसके बाद कामधेनु, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, रंभा, मां लक्ष्मी, वारुणी, चंद्रमा, पारिजात वृक्ष, पांचजन्य शंख, भगवान धन्वंतरि और अमृत कलश प्रकट हुए। रत्नों के बंटवारे के बाद जब अमृत कलश असुरों के हाथ लगा तो उसके लिए उनमें ही विवाद शुरू हो गया।
लोक कल्याण के लिए विषपान ही भगवान शिव की सबसे बड़ी सीख
कथा के दौरान हलाहल विष के प्रसंग को विशेष रूप से विस्तार देते हुए भैया जी ने कहा कि समुद्र मंथन से निकला विष इतना प्रचंड था कि उससे पूरी सृष्टि के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया। उस समय भगवान शिव ने आगे बढ़कर हलाहल विष को अपने कंठ में धारण कर लिया और सृष्टि को विनाश से बचाया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और तभी से वे "नीलकंठ" कहलाए।
उन्होंने कहा कि भगवान शिव का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो संकट के समय दूसरों को बचाने के लिए स्वयं कठिनाई सहने को तैयार रहे। देवाधि देव भगवन शिव ने विष को अपने भीतर उतारकर उसे फैलने नहीं दिया। यही त्याग, संयम और लोक कल्याण की भावना शिवत्व का आधार है।
बच्चों ने निकाली कांवड़ यात्रा
इस अवसर पर संस्थान की निदेशक वंदना अग्रवाल जी के नेतृत्व में नारायण चिल्ड्रन एकेडमी के बच्चों ने कांवड़ यात्रा निकाली। बच्चों ने भक्ति भाव के साथ भगवान शिव का जलाभिषेक किया और सावन के इस पवित्र अवसर पर शिव आराधना की।
कार्यक्रम में संस्थान के संस्थापक एवं चेयरमैन कैलाश जी मानव भी उपस्थित रहे। उन्होंने संस्थान से लाभान्वित दिव्यांगजनों को आशीर्वाद दिया और सभी को भगवान शिव के बताए सेवा, संयम और परोपकार के मार्ग पर चलने का संदेश दिया।